लगभग बारह वर्ष पूर्व मैंने एफ्रो -दलि त सि द्धां त का तब प्रति का र कि या था, जब वह अपनी प्रा रंभि क अवस्था में ही था । इस सि द्धां त के अनुसा र दलि त भा रत के अश्वेत
(ब्लैक) हैं और गैर-दलि त श्वेत (वा इट) हैं। ऐसा मा नकर यह सि द्धां त दा वा करता है कि भा रती य समा ज की जा ति -व्यवस्था नस्लवा द (रेसि ज़्म) के समतुल्य है। अपनी
पुस्तक ‘ब्रेकिं ग इंडि या ’ में मैंने अमेरि का से संचा लि त और आर्थि क रूप सेपो षि त इस एफ्रो -दलि त परि यो जना की का र्यप्रणा ली को समझा या था ।
यह परि यो जना अमेरि की नस्लवा द के सि द्धां त के उपयो ग द्वा रा भा रत के सामा जि क मतभेदों को भड़का कर हमा रेदेश को वि खंडि त करना चा हती है। इस पर भा रती यों
को प्रति क्रि या देनी चा हि ए कि दमन का इति हा स वा स्तवि कता में कि सी अन्य नि ष्कर्ष की ओर संकेत करता है। जि स प्रका र श्वेत अमेरि कि यों द्वा रा अश्वेतों का शो षण
कि या गया , उसी प्रका र भा रत में हिं दुओं का शो षण हजा र वर्ष तक वि देशी आक्रां ता ओं और यूरोपि यों ने उपनि वेशी करण द्वा रा कि या ।
हिं दुओं को हिं दू संस्कृति और इति हा स के बा रेमें अमेरि का के अश्वेतों को समझा कर, उनके सा थ मि लकर एक समा न आधा रभूमि खोजनी चा हि ए थी । इसा बेल
वि ल्करसन एक प्रमुख अश्वेत वि द्वा न हैं। कुछ समय पूर्व उन्हों ने एक पुस्तक लि खी जि समें एफ्रो -दलि त समुदा य को वि श्व में उत्पी ड़ि त वर्गों के केंद्रबिं दु के रूप में दर्शा या ।
‘का स्ट : दि ओरि जि न्स ऑफ अवर डि स्कंटेंट्स’ शी र्षक वा ली यह पुस्तक घो षणा करती है कि अनेक प्रका र के नस्लवा दों में का स्ट (भा रती य जा ति -वर्ण व्यवस्था के अर्थ
में) केवल एक प्रका र मा त्र नहीं है।
कास्ट तो वह रीढ़ की हड्डी है, जि स पर सम्पूर्ण रेसि ज़्म का सि द्धां त खड़ा है। उनका मा नना है कि अंग्रेज का स्ट की धा रणा को वैदि क ग्रंथों से सी खकर अमेरि का में ले
गए और फि र उसके आधा र पर उन्हों ने अमेरि का में अश्वेतों के वि रुद्ध रेसि ज़्म का ढां चा खड़ा कि या । यह पद्धति यूरोप में भी फैली , जि सके फलस्वरूप ना जि यों द्वा रा
यहूदि यों का जनसंहार (हो लो कॉ स्ट) हुआ।
इस प्रका र वि ल्करसन यह अटपटा दा वा करती हैं कि वि श्व में रेसि ज़्म का मूल का रण भा रत की जा ति -व्यवस्था है। उनके द्वा रा तर्क दि या जा ता है कि जा ति कर्म सि द्धां त
के का रण अमि ट रूप सेहिं दू धर्म के साथ जुड़ी है। मुझे भा रत के दलि तों और अमेरि का के अश्वेतों से सहा नुभूति है। लेकि न वि ल्करसन की मा न्यता से मुझे यह समस्या
है कि यह अमेरि की इति हा स के चश्मे का उपयो ग करके दलि तों सेसंबंधि त मुद्दों को देखने का प्रया स करती है।
भा रती य सामा जि क व्यवस्था का इति हा स बहुत जटि ल है और इसेऐसेएकां गी वि श्लेषण द्वा रा नहीं समझा जा सकता । यदि इस सि द्धां त की सी मा मा त्र शैक्षणि क
संस्था ओं तक ही हो ती तो भी ठी क था, किं तु वि ल्करसन के इस सि द्धां त को अमरीकी सो शल मी डि या में बड़ी लो क प्रसि द्धि मि ली है। वि ल्करसन पुलि त्ज़र पुरस्का र
वि जेता हैं और उनकी कि ता ब न्यूयॉ र्क टा इम्स की बेस्टसेलर पुस्तकों की श्रेणी में पहला स्था न प्रा प्त कर चुकी है।
ओप्रा वि नफ्रे ने भी उनकी पुस्तक का प्रचा र कि या है। यह सि द्धां त अब ब्लैक ला इव्स मैटर आंदो लन और नई वो क सो शल जस्टि स वि चा रधा रा का केंद्री य अंग बन चुका
है। इसेएक स्वतंत्र अभि व्यक्ति या सोच के रूप में मा ना जा सकता था यदि दलि तों से अश्वेतों और ब्रा ह्मणों से श्वेतों की तुलना को एक वा द-यो ग्य परि कल्पना के रूप में
प्रस्तुत कि या जा ता ।
कि न्तु इसेएक नि र्वि वा द तथ्य के रूप में प्रस्तुत कि या जा रहा है। परि णा मस्वरूप सामा जि क न्या य आंदो लन हिं दुओं से द्वेष के आंदो लन में परि वर्ति त हो चुका है। भा रत
को वि श्व-दमन के स्रो त के रूप में दर्शा या जा रहा है। इस वि चा र-सरणी का प्रति का र करना जरूरी है।
पश्चि म का सामा जि क न्या य आंदो लन हिं दुओं सेद्वेष के आंदो लन में परि वर्ति त हो चुका है। दलि तों से अश्वेतों और ब्रा ह्मणों से श्वेतों की तुलना करके भा रत को वि श्व-
दमन के स्रो त के रूप में दर्शा या जा रहा है।
(ये लेखक के अपने वि चा र हैं।)









